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उम्र के पड़ाव और अनुभव

जब से होश संभाला जीवन ने बस उठा पटक ही की है मेरे साथ ।  शिकायत नही हैं , पर थोड़ा सा दुख जरूर होता है । जब जब जीवन ने दुख दिया हर बार किस्मत को मन भर कोसा और भगवान के सामने तो ढेर ही लगा दिया शिकायतों का । ऐसा लगता था मानो दुनिया की सबसे दुखी इंसान में ही हूं। पर जैसे जैसे समय बीतता गया समझ में आता गया कि ये सब तो बस सोना तपाने की प्रक्रिया थी बस । खूब तराशा है सच में मुझे भगवान ने । एक एक करके सारी कमियां दूर करते गए मेरी । हर बार की परीक्षा का एक नया ही परिणाम आया है मेरे सामने । पहले जो जीवन बस रोने में , शिकायते करने में गुजरता था , वही अब बस प्रभु को धन्यवाद देने में ही बीत रहा है । अब समझ में आ रहा है को क्यों अनुभवी इंसान के पास बैठने को बड़े बुजुर्ग कहा करते थे। ।🙏

जीवन का फलसफा

जीवन में कभी भी कुछ बेमतलब नही होता है।बस हम समझ नही पाते उस वक्त जब वो हमारे साथ हो रहा होता है।भगवान ने सब कुछ पहले से ही तय कर दिया होता है। हमारे जन्म के साथ ही हमारी किस्मत भी तय हो जाती है।मुझे बस इतना पता है कि किस्मत पर तो किसी का जोर नहीं चलता हैं, पर मेहनत करने से कोई रोक सकता है क्या। मेहनत वो रास्ता हैं जिस पर चल कर मैने लोगों को किस्मत से लड़ते और जीतते हुए देखा है।क्या हम वो नही बन सकते। हम लड़ते नही है बस।और किस्मत के आगे घुटने टेक देते है।और ताउम्र उसे कोसने में ही बीता देते है।।सही नहीं है ना पर ये तो।

सही समय पर शिक्षा का मूल्य न समझने के परिणाम।

हर उम्र की अपनी ही एक मांग होती है , जिसे उसी समय में पूरा कर देना उचित होता है । विद्यार्थी जीवन उम्र का वह पड़ाव है , जहा बस शिक्षित होना ही मांग हो सकती हैं।परंतु अफसोस बच्चे उस मांग को अनदेखा कर देते है और जीवन दूसरी व्यर्थ की बातो में गवां देते है।और जब तक बात समझ आती है तब तक सब कुछ हाथों से निकल गया होता है। रह जाता है बस पछतावा ।शिक्षा एकमात्र जरिया है , जीवन में आने वाली हर परिस्थिति का मुकाबला करने का । शौक तो कभी भी पूरे किए जा सकते है , पर अधूरी शिक्षा बाद में पूरी करना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए समय रहते ही इसका महत्व समझ लेना ही सही है।

मजबूरी

हम सोचते है कि सब कुछ हमारे हाथ में होता है। हम जैसे चाहे वैसे अपनी जिंदगी जी सकते है। पर जब समय की मार पड़ती हैं तो हमे ये बात समझ में आ जाती हैं कि हम परिस्थिति के आगे कितने मजबूर होते है। अपना सम्मान , आत्मगौरव और स्वाभिमान सब परे रख कर हालात के साथ ना चाहते हुए भी  समझौता करना पड़ता है , वो भी अपने आसूं छुपा कर हंसते हुए। आखिर ये जिंदगी क्यों इतने इम्तहान लेती है हमारे।  जो हम नही चाहते बार बार उसी के सामने क्यों लाकर खड़ा कर देती है।।क्यों परिस्थितियां हमे इतना मजबूर कर देती है कि ना चाहते हुए भी हमसे वही करवाती है जिसके लिया आत्मा तैयार नही होती।

जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए। वैसे तो ये एक गाने की पंक्तियां है पर कभी कभी ऐसा लगता हैं कि जैसे ये मेरे लिए ही लिखी गई है।जब भी ऐसा लगता है बस खुशी मेरी झोली में आने ही वाली है अचानक से कुछ हो जाता है और खुशियां मेरे हाथ से सरक जाती है।अब तो जैसे उम्मीद भी मेरा दामन छोड़ने लगीं है।।हर तरफ बस निराशा ही दिखाई देती है।। अपनों की भीड़ में अक्सर खुद को तन्हा पाती हू। ये अकेलापन कही मेरी जान न ले ले तो अच्छा है। किसी तरह अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर लूं बस ।उससे ज्यादा जीने की चाहत बची नहीं अब मुझमें। लोग तो तोडते तोडते नहीं थकते पर में शायद अब टूटते टूटते थक गई हूं। जोड़ने के निशान भी अब तो दिखने लगे है।मन पर भी और तन पर भी। बस किसी तरह भगवान मेरी आत्मा को मुक्ति और शांति दोनो दे तो अच्छा है।

दिल के ज़ख्म जो दिखते नही पर दुखते बहुत है।

जीवन जीने का सही तरीका

सब जैसे जीते है क्या वही जीना होता है सही मायने में।सुख दुख आशा निराशा तो सबके जीवन में आते जाते ही रहते है।पर उनके आगे घुटने क्यों टेक देना।दुख न आए तो भला सुख का मोल कोई क्या जानेगा।निराशा भरे जीवन से ही तो आशा की किरण निकलती है न।फिर शिकायत किस बात की। और  गम कैसा।

https://chandrakantatiwari77.wordpress.com/2022/05/05/6/

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