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Showing posts from January, 2022

क्या कहूँ मैं ।

ऐसा क्यो होता है कि कभी तो दामन इतनी  खुशियों से भर जाता है, कि लगता है यदि उन्हे संभाला न गया तो बस छलक ही जाएगी । और कभी इतना दुःख कि बस समेटते ही रह जाओ खत्म ही नहीं होता । आखिर क्यों । मैं भी जानती हूँ कि यही जीवन हैं | पर कई बार जीवन इन सब फिलोसोफि को मानने से बस इंकार कर देता है तो है।

गीत गाता चल रे मेरे मन ।

जिम्मेदारियां इन्सान को सच में क्या से क्या बना देती है। सब कुछ बदल जाता है । उछलती कूदती लहरो सा इन्सान गहरी नदी सा शान्त हो जाता है । चुलबुलापन गंभीरता के पीछे कहीं खो जाता है। इन्सान बस अपनी जिमेदारियो का चोला पहन कर खुश रहने लगता है परंतु क्या इन सबके उसके अन्दर का वास्तविक रूप सच में खो जाता है क्या ? नहीं, वो राह देखता है हर उस एक मौके की जहाँ उसे फिर से खुद के लिए जीने का बस एक मौका मिल जाए।

जीवन के कुछ गलत चयन का परिणाम।

जीवन में सबको कभी न कभी अपने हिसाब से जीवन जीने का मौका जरूर मिलता है।।पर उसे समझकर उसका फायदा जो ले लेता है वो तो जीवन में सुख पा लेता है पर जो इस मौके को गवां देता है उसके पास पूरी जिंदगी सिवा पछताने के कुछ नही बचता। ये अफसोस इंसान को अंदर ही अंदर दीमक की तरह धीरे धीरे खाता रहता है और खोखला बनाता जाता है।इतना खोखला कि इंसान कब अंदर से पूरी तरह से खाली हो जाता है उसे खुद को भी पता नहीं चलता है।

जिन्दगी का फलसफा

जब हम जीवन जीना शुरु करते हैं। तब होते हैं उसमे ढेर सारे सपने जिन्हे देखने से पहले मन एक बार भी शंकित तक नही होता कि ये कभी पूरे भी होगे या नहीं। दिल बस दिन रात आजद पंछी की तरह ऊँची ऊँची उड़ाने भरने में लगा रहता है । लेकिन जब समय बडी बेरहमी से उन पंखो को कतरने लगता है। तब ऑखो से ऑसुओ के साथ सपने भी कब बह जाते है पता ही नही चलता । जीवन कब उम्मीदों का दामन छोड़ कर नाउम्मीद बनने लग जाता है जब तक इसका एहसास होता है दिल सपने देखना छोड़ चुका होता है।क्या सबकी जिंदगी ऐसी ही होती है ?