क्या कहूँ मैं ।

ऐसा क्यो होता है कि कभी तो दामन इतनी  खुशियों से भर जाता है, कि लगता है यदि उन्हे संभाला न गया तो बस छलक ही जाएगी । और कभी इतना दुःख कि बस समेटते ही रह जाओ खत्म ही नहीं होता । आखिर क्यों । मैं भी जानती हूँ कि यही जीवन हैं | पर कई बार जीवन इन सब फिलोसोफि को मानने से बस इंकार कर देता है तो है।

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