जिंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए। वैसे तो ये एक गाने की पंक्तियां है पर कभी कभी ऐसा लगता हैं कि जैसे ये मेरे लिए ही लिखी गई है।जब भी ऐसा लगता है बस खुशी मेरी झोली में आने ही वाली है अचानक से कुछ हो जाता है और खुशियां मेरे हाथ से सरक जाती है।अब तो जैसे उम्मीद भी मेरा दामन छोड़ने लगीं है।।हर तरफ बस निराशा ही दिखाई देती है।। अपनों की भीड़ में अक्सर खुद को तन्हा पाती हू। ये अकेलापन कही मेरी जान न ले ले तो अच्छा है। किसी तरह अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर लूं बस ।उससे ज्यादा जीने की चाहत बची नहीं अब मुझमें। लोग तो तोडते तोडते नहीं थकते पर में शायद अब टूटते टूटते थक गई हूं। जोड़ने के निशान भी अब तो दिखने लगे है।मन पर भी और तन पर भी। बस किसी तरह भगवान मेरी आत्मा को मुक्ति और शांति दोनो दे तो अच्छा है।
दिल के ज़ख्म जो दिखते नही पर दुखते बहुत है।
Comments
Post a Comment