गीत गाता चल रे मेरे मन ।
जिम्मेदारियां इन्सान को सच में क्या से क्या बना देती है। सब कुछ बदल जाता है । उछलती कूदती लहरो सा इन्सान गहरी नदी सा शान्त हो जाता है । चुलबुलापन गंभीरता के पीछे कहीं खो जाता है। इन्सान बस अपनी जिमेदारियो का चोला पहन कर खुश रहने लगता है परंतु क्या इन सबके उसके अन्दर का वास्तविक रूप सच में खो जाता है क्या ? नहीं, वो राह देखता है हर उस एक मौके की जहाँ उसे फिर से खुद के लिए जीने का बस एक मौका मिल जाए।
Really very true
ReplyDeleteMam very inspiring...
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