जिन्दगी का फलसफा

जब हम जीवन जीना शुरु करते हैं। तब होते हैं उसमे ढेर सारे सपने जिन्हे देखने से पहले मन एक बार भी शंकित तक नही होता कि ये कभी पूरे भी होगे या नहीं। दिल बस दिन रात आजद पंछी की तरह ऊँची ऊँची उड़ाने भरने में लगा रहता है । लेकिन जब समय बडी बेरहमी से उन पंखो को कतरने लगता है। तब ऑखो से ऑसुओ के साथ सपने भी कब बह जाते है पता ही नही चलता । जीवन कब उम्मीदों का दामन छोड़ कर नाउम्मीद बनने लग जाता है जब तक इसका एहसास होता है दिल सपने देखना छोड़ चुका होता है।क्या सबकी जिंदगी ऐसी ही होती है ?

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